ॐ स्थापकाय च धर्मस्य सर्वधर्मस्वरूपिणे। अवतारवरिष्ठाय रामकृष्णाय ते नमः॥ ॐ नमः श्री भगवते रामकृष्णाय नमो नमः॥ ॐ नमः श्री भगवते रामकृष्णाय नमो नमः॥ ॐ नमः श्री भगवते रामकृष्णाय नमो नमः॥

Sunday, May 31, 2020

Bhagavad Gita' classes in English by Srimath Swami Gautamanandaji

'Bhagavad Gita' classes in English by Srimath Swami Gautamanandaji Maharaj that were being conducted in Ramakrishna Math, Mylapore, Chennai will now be continued online every Sunday on YouTube.

Tuesday, May 5, 2020

भगवान नरसिंह का जन्मोत्सव

बुधवार, 6 मई आज भगवान विष्णु के चौथे अवतार नरसिंह का जन्मोत्सव मनाया जाएगा। पद्म पुराणके अनुसार प्राचीन समय में वैशाख महीने के शुक्लपक्ष की चतुर्दशी तिथि पर भगवान नरसिंह प्रकट हुए थे। कथा के अनुसार राक्षस हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रहलाद भगवान विष्णु का भक्त था। इसीलिए हिरण्यकशिपु प्रहलाद पर अत्यचार करता था और कई बार उसे मारने की कोशिश भी की। भगवान विष्णु ने अपने भक्त को बचाने के लिए एक खंबे से नरसिंह रूप में अवतार लिया। इनका आधा शरीर सिंह का और आधा इंसान का था। इसके बाद भगवान नरसिंह ने हिरण्यकशिपु को मार दिया।

क्यों लिया ऐसा अवतार: आधा शरीर इंसान और आधा शेर
नरसिंह रूप भगवान विष्णु का रौद्र अवतार है। ये दस अवतारों में चौथा है। नरसिंह नाम के ही अनुसार इस अवतार में भगवान का रूप आधा नर यानी मनुष्य का है और आधा शरीर सिंह यानी शेर का है। राक्षस हिरण्यकश्यप ने भगवान की तपस्या कर के चतुराई से वरदान मांगा था। जिसके अनुसार उसे कोई दिन में या रात में, मनुष्य, पशु, पक्षी कोई भी न मार सके। पानी, हवा या धरती पर, किसी भी शस्त्र से उसकी मृत्यु न हो सके। इन सब बातों को ध्यान में रख भगवान ने आधे नर और आधे मनुष्य का रूप लिया। दिन और रात के बीच यानी संध्या के समय, हवा और धरती के बीच यानी अपनी गोद में लेटाकर बिना शस्त्र के उपयोग से यानी अपने ही नाखूनों से हिरण्यकश्यप को मारा।
भगवान विष्णु का ये अवतार बताता है कि जब पाप बढ़ जाता है तो उसको खत्म करने के लिए शक्ति के साथ ज्ञान का उपयोग भी जरूर हो जाता है। इसलिए ज्ञान और शक्ति पाने के लिए भगवान नरसिंह की पूजा की जाती है। इस बात का ध्यान रखते हुए ही उन्हें ठंडक और पवित्रता के लिए चंदन चढ़ाया जाता है।

भगवान नरसिंह से जुड़ी खास बातें
भगवान नरसिंह की विशेष पूजा संध्या के समय की जानी चाहिए। यानी दिन खत्म होने और रात शुरू होने से पहले जो समय होता है उसे संध्याकाल कहा जाता है। पुराणों के अनुसार इसी काल में भगवान नरसिंह प्रकट हुए थे।
भगवान नरसिंह की पूजा में खासतौर से चंदन चढ़ाया जाता है और अभिषेक किया जाता है। ये भगवान विष्णु के रौद्र रूप का अवतार है। इसलिए इनका गुस्सा शांत करने के लिए चंदन चढ़ाया जाता है। जो कि शीतलता देता है। दूध, पंचामृत और पानी से किया गया अभिषेक भी इस रौद्र रूप को शांत करने के लिए किया जाता है।
पूजा के बाद भगवान नरसिंह को ठंडी चीजों का नैवेद्य लगाया जाता है। इनके भोग में ऐसी चीजें ज्यादा होती हैं जो शरीर को ठंडक पहुंचाती हैं। जैसे दही, मक्खन, तरबूज, सत्तू और ग्रीष्म ऋतुफल चढ़ाने से इनको ठंडक मिलती है और इनका गुस्सा शांत रहता है।
वैशाख महीने के शुक्लपक्ष की चतुर्दशी तिथि पर भगवान नरसिंह के प्रकट होने से इस दिन जल और अन्न का दान दिया जाता है। जो भी दान दिया जाता है वो, चांदी या मिट्‌टी के बर्तन में रखकर ही दिया जाता है। क्योंकि मिट्‌टी में शीतलता का गुण रहता है।

Saturday, May 2, 2020

Bhagwan Shri Shri Ramkrishn Paramhans Dev Ki Leela Hindi By youtube link


श्रीगुरु-प्रार्थना




श्रीगुरु-प्रार्थना

भवसागर-तारण-कारण हे । रविनन्दन-बन्धन-खण्डन हे ।।

शरणागत  किंकर भीत मने । गुरुदेव दया करो दीनजने ।१।

हृदिकन्दर-तामस-भास्कर हे । तुमि विष्णु प्रजापति शंकर हे ।।
परब्रह्म परात्पर वेद भणे । गुरुदेव दया करो दीन जने ।२।
मनवारण-शासन-अंकुश हे । नरत्राण तरे हरि चाक्षुष हे ।।
गुणगान -परायण देवगणे । गुरुदेव दया करो दीनजने ।३।
       कुलकुण्डलिनी-घुम-भंजक हे । हृदिग्रंथि- वदारण-कारक हे ।।
  मम मानस चंचल रात्रदिने ।गुरुदेव दया करो दीनजने ।४। 
        रिपुसूदन मंगलनायक हे। सुख शान्ति -वराभय-दायक  हे ।।
त्रयताप हरे तव नाम गुणे । गुरुदेव दया करो दीनजने ।५।  
    अभिमान- प्रभाव-विमर्दक हे ।गतिहीन-जने तुमि रक्षक हे ।।
        चित शंकित वंचित भक्तिधने ।  गुरुदेव दया करो दीनजने ।६।
      तव नाम सदा शुभसाधक हे । पतिताधम-मानव-पावक हे ।।
    महिमा तव गोचर शुद्ध मने ।गुरुदेव दया करो दीनजने ।७। 
       जय सद्गुरु ईश्वर-प्रापक हे । भवरोग-विकार-विनाशक हे ।।
            मन जेन रहे तव श्रीचरणे । गुरुदेव दया करो दीनजने ।८।


Friday, May 1, 2020

रामकृष्ण मिशन / स्थापना दिवस – 1 मई, 1897

रामकृष्ण मिशन / स्थापना दिवस – 1 मई, 1897
भारत मे ब्रिटिश राज के समय , ब्रिटिश ईसाई हिन्दू धर्म की कटु निंदा करके हिन्दुओं को ईसाई मत में मतांतरित करने के अभियान में जुटे थे। हिन्दू संतों की निंदा के लिए उन्होंने तर्क दिया कि ये सिर्फ आत्ममोक्ष के लिए तपस्या करते हैं, समाज को इनसे क्या मिलता है। ईसाई मिशनरियों और संस्थानों की समाज सेवा का ढोल पीटने वाले ईसाइयों और हिन्दू संतों की भत्र्सना का जवाब देने का विचार स्वामी रामकृष्ण परमहंस के शिष्य स्वामी विवेकानंद ने किया। और कहा, “जो गरीब, कमजोर और बीमार में शिव के दर्शन करता है, वही सही अर्थों में शिव की पूजा करता है’ “जीवे सेवा शिवेर सेवा’। स्वामी विवेकानंद द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन का ध्येय वाक्य बन गया, “आत्मनो मोक्षार्थम्-जगत् हिताय’ अर्थात् आत्ममोक्ष के प्रयास के साथ समाज सेवा। इसी ध्येय को लेकर 1897 में रामकृष्ण मिशन की स्थापना हुई।
जाति, पंथ, मत की दीवारों को तोड़कर रामकृष्ण मिशन ने सर्वप्रथम सामाजिक समरसता का उद्घोष किया। मुस्लिम हो, ईसाई हो या हिन्दू- रामकृष्ण मठ में सभी को दीक्षा दी। लेकिन सभी के लिए एक अनिवार्यता थी 9 साल तक हिन्दू धर्म के अनुसार यज्ञोपवीत धारण, चोटी-रखना और साथ ही समाज के हर वर्ग को देखना। रामकृष्ण मिशन के संन्यासियों के लिए मंदिर में प्रार्थना और अस्पताल में रोगियों की सेवा में कोई अंतर नहीं। रामकृष्ण मिशन ने ज्ञान को कर्म के साथ जोड़ा।
सामाजिक समरसता का उद्घोष तो स्वयं स्वामी रामकृष्ण ने ही किया था। उन्होंने इस्लामी सिद्धांतों का अध्ययन किया, कुरान के अनुसार कई दिन तक नमाज भी पढ़ी, ईसा का विचार भी ग्रहण किया। और फिर निष्कर्ष रूप में सनातन धर्म के मूल “एकम्सद् विप्रा: बहुधा वदन्ति’ का साक्षात् लोगों को कराया। उनके अनुयायियों में ईसाई भी थे और मुसलमान भी। सभी ने सनातन हिन्दू धर्म के मूल सिद्धांतों पर चलते हुए ज्ञान के साथ कर्म को भी अपनाया। समाज सेवा के विभिन्न क्षेत्रों में रामकृष्ण मिशन ने हाथ बढ़ाया।

Monday, April 27, 2020

आदि शंकराचार्य का जीवन परिचय एवम जयंती


शंकराचार्य जी को,आदिशंकराचार्य भी कहा जाता है आप साक्षात् भगवान शिव के अवतार थे . आपने परमेश्वर के विभिन्न रूपों से लोगो को अवगत कराया जिसमे, आपने यह बताया कि,

  • ईश्वर क्या है ?
  • ईश्वर का जीवन मे महत्व क्या है ?

यह ही नही आपने अपने जीवनकाल मे, ऐसे कार्य किये जो बहुत ही सरहानीय है और भारत की, अमूल्य धरोहर के रूप मे आज भी है . आपने हिन्दू धर्म को बहुत ही खूबसूरती से एक अलग अंदाज मे निखारा, इसी के साथ अनेक भाषाओं मे, आपने अपने ज्ञान का प्रकाश फैलाया . आपने विभिन्न मठो की स्थापना की इसी के साथ कई शास्त्र, उपनिषद भी लिखे .

आदिशंकराचार्य जी का जीवन परिचय ( Shankaracharya history )

आदिशंकराचार्य जी साक्षात् भगवान का रूप थे . आप केरल के साधारण ब्राह्मण परिवार मे जन्मे थे . आपकी जन्म से आध्यात्मिक क्षेत्र मे रूचि रही है जिसके चलते, सांसारिक जीवन से कोई मोह नही था . आपको गीता,उपन्यास, उपनिषद् , वेदों और शास्त्रों का स्वज्ञान प्राप्त था, जिसे आपने पूरे विश्व मे फैलाया.

आदि शंकराचार्य का जीवन परिचय ( Adi Shankaracharya biography in hindi)

जन्म788 ई.
मृत्यु820 ई.
जन्मस्थानकेरल के कलादी ग्राम मे
पिताश्री शिवागुरू
माताश्रीमति अर्याम्बा
जातिनाबूदरी ब्राह्मण
धर्महिन्दू
राष्ट्रीयताभारतीय
भाषासंस्कृत,हिन्दी
गुरुगोविंदाभागवात्पद
प्रमुख उपन्यासअद्वैत वेदांत

शंकराचार्य जी की जन्म व मृत्यु (shankaracharya Birth & Death)

जन्म- आदिशंकराचार्य जी का जन्म 788 ई. मे, केरल के एक छोटे से, गाव कलादी मे हुआ था. शंकराचार्य जी के जन्म की एक छोटी सी कथा है जिसके अनुसार, शंकराचार्य के माता-पिता बहुत समय तक निसंतान थे . कड़ी तपस्या के बाद, माता अर्याम्बा को स्वप्न मे भगवान शिव ने, दर्शन दिये और कहा कि, उनके पहले पुत्र के रूप मे वह स्वयं अवतारित होंगे परन्तु, उनकी आयु बहुत ही कम होगी और, शीघ्र ही वे देव लोक गमन कर लेंगे . शंकराचार्यजी जन्म से बिल्कुल अलग थे, आप स्वभाव मे शांत और गंभीर थे . जो कुछ भी सुनते थे या पढ़ते थे, एक बार मे समझ लेते थे और अपने मस्तिष्क मे बिठा लेते थे . शंकराचार्य जी ने स्थानीय गुरुकुल से सभी वेदों और लगभग छ: से अधिक वेदांतो मे महारथ हासिल कर ली थी . समय के साथ यह ज्ञान अथा होता चला गया और आपने स्वयं ने अपने इस ज्ञान को, बहुत तरह से जैसे- उपदेशो के माध्यम के, अलग-अलग मठों की स्थापना करके, ग्रन्थ लिख कर कई सन्देश लोगो तक पहुचाया. आपने सर्वप्रथम योग का महत्व बताया, आपने ईश्वर से जुड़ने के तरीको का वर्णन और महत्व बताया . आपने स्वयं ने विविध सम्प्रदायों को समझा उसका अध्ययन कर लोगो को उससे अवगत कराया .

मृत्यु- 820 ई मे आपका देव लोक गमन हो गया था , अर्थात् मात्र बत्तीस वर्ष आपने, इस संसार के साथ व्यतीत करके उसे धन्य कर दिया .

जीवनशैली

जन्म से ही आदिशंकराचार्य जी जीवन शैली कुछ भिन्न थी . शंकराचार्य जी ने वेद-वेदांतो के इस ज्ञान को भारत के चारों कोनो मे फैलाया . उनका उद्देश्य प्रभु की दिव्यता से लोगो को अवगत कराना अद्वैत कहावत के अनुसार ब्रह्म सर्वत्र है या स्व ब्रह्म है अर्थात् ब्रह्म का मै और मै कौन हू ? का सिद्धांत शंकराचार्य द्वारा प्रचारित किया गया . इसी के साथ शिव की शक्ति और उसकी दिव्यता बताई गई . शंकराचार्य द्वारा कथित तथ्य और सिद्धांत जिसमे सांसारिक और दिव्य अनुभव दोनों का बेजोड़ मिलन है, जो कही देखने को नही मिलता है . शंकराचार्य ने कभी किसी देवता के महत्व को कम नही किया ना ही उनकी बाहुल्यता को कम किया . इन्होंने अपने जीवनशैली के माध्यम से लोगो जीवन के तीन वास्तविक स्तरों से अवगत कराया .

तीन वास्तविक स्तर

shankaracharya


  1. प्रभु – यहा ब्रह्मा,विष्णु, और महेश की शक्तियों का वर्णन किया गया था .
  2. प्राणी – मनुष्य की स्वयं की आत्मा – मन का महत्व बताया है .
  3. अन्य – संसार के अन्य प्राणी अर्थात् जीव-जन्तु, पेड़-पौधे और प्राकृतिक सुन्दरता का वर्णन और महत्व बताया है .

इस प्रकार इन तीन को मिला कर, उनके साथ भक्ति,योग, और कर्म को जोड़ दिया जाये तो जो, आनंद प्राप्त होता है वो, बहुत ही सुखद होता है . इसी तरह का जीवन स्वयं व्यतीत कर, अपनी ख्याति सर्वत्र फैलाते थे .

कार्यकाल

आदिशंकराचार्य जी ने बहुत कम उम्र मे, तथा बहुत कम समय मे अपने कार्य के माध्यम से, अपने जीवन के उद्देश्य को पूर्ण किया . आपके जीवन के बारे मे यहा तक कहा गया है कि आपने महज दो से तीन वर्ष की आयु मे सभी शास्त्रों , वेदों को कंठस्थ कर लिया था . इसी के साथ इतनी कम आयु मे, भारतदर्शन कर उसे समझा और सम्पूर्ण हिन्दू समाज को एकता के अटूट धागे मे पिरोने का अथक प्रयास किया और बहुत हद तक सफलता भी प्राप्त की जिसका जीवित उदहारण उन्होंने स्वयं सभी के सामने रखा और वह था कि आपने सर्वप्रथम चार अलग-अलग मठो की स्थापना कर उनको उनके उद्देश्य से अवगत कराया . इसी कारण आपको जगतगुरु के नाम से नवाज़ा गया और आप चारो मठो के प्रमुख्य गुरु के रूप मे पूजे जाते है .

शंकराचार्य चार मठो के नाम (shankaracharya math Name)

shankaracharya math

  1. वेदान्त मठ – जिसे वेदान्त ज्ञानमठ भी कहा जाता है जोकि, सबसे पहला मठ था और इसे , श्रंगेरी रामेश्वर अर्थात् दक्षिण भारत मे, स्थापित किया गया .
  2. गोवर्धन मठ – गोवर्धन मठ जोकि, दूसरा मठ था जिसे जगन्नाथपुरी अर्थात् पूर्वी भारत मे, स्थापित किया गया .
  3. शारदा मठ – जिसे शारदा या कलिका मठ भी कहा जाता है जोकि, तीसरा मठ था जिसे, द्वारकाधीश अर्थात् पश्चिम भारत मे, स्थापित किया गया .
  4. ज्योतिपीठ मठ – ज्योतिपीठ मठ जिसे बदरिकाश्रम भी कहा जाता है जोकि, चौथा और अंतिम मठ था जिसे, बद्रीनाथ अर्थात् उत्तर भारत मे, स्थापित किया गया .

इस तरह आदिशंकराचार्य जी ने, भारत भ्रमण कर इन मठो की, स्थापना कर चारो ओर, हिन्दुओ का परचम लहराया .

प्रमुख्य ग्रन्थ – आदिशंकराचार्य जी ने हिन्दी,संस्कृत जैसी भाषओं का प्रयोग कर दस से अधिक उपनिषदों , अनेक शास्त्रों, गीता पर संस्करण और अनेक उपदेशो को , लिखित व मौखिक लोगो तक पहुचाया . आपने अपने जीवन मे, कुछ ऐसे कार्यो की शुरूवात कि, जो उससे पहले कभी नही हुई थी . आपने अपने जीवन मन , आत्मा और ईश्वर को बहुत खूबसूरती से, अपने जीवन मे जोड़ा और लोगो को, इनके मिलाप से होने वाले अनुभव से अवगत कराया .

प्रमुख सन्देश  

आदिशंकराचार्य जी ने तो अपने जीवनकाल मे इतना कुछ लिखा और बहुत अच्छे सन्देश दिये है जिसे हर कोई गंभीरता से सोंचे और अपने जीवन में उतारे तो यह जीवन धन्य हो जायेगा . वैसे आपके उपर कई लेख, और पुस्तके लिखी भी गई है . हम अपने इस संस्करण मे आफ्ही के द्वारा कथित कुछ महत्वपूर्ण सन्देश लोगो तक पंहुचा रहे है .

शंकराचार्यजी द्वारा अनमोल वचन (Shankaracharya quotes )

shankaracharya quotes



Tuesday, April 21, 2020

स्वामी विवेकानन्द और उनका सन्देश


यदि हिंदू धर्म के दूत के रूप में उनका कुछ अपना होता, तो स्वामी विवेकानन्द, जो कुछ थे, उससे कम महान् सिद्ध हुए होते। गीता के कृष्ण की भांति, बुद्ध की भांति, शंकराचार्य की भांति, भारतीय चिन्तन के अन्य महान् विचारक की भांति, उनके वाक्य भी वेदों और उपनिषदों के उद्धरणों से परिपूर्ण हैं। भारत के पास जो उसकी अपनी ही निधियां सुरक्षित हैं, उन्हें भारत के लिए ही उनके उद्घाटक तथा भाष्यकार के रूप में ही स्वामीजी का महत्व है। यदि उन्होंने कभी जन्म लिया ही ना होता तो भी जिन सत्यों का उन्होंने उपदेश किया, वे वैसे ही सत्य बने रहते। यही नहीं, वे सत्य उतने ही प्राणामिक भी बने रहते। अन्तर केवल होता - उनकी ग्राहयता की कठिनाई में, उनकी अभिव्यक्ति में आधुनिकता, स्पष्टता और तीक्ष्णता के अभाव में; और उनके पारस्परिक सामंजस्य एवं एकता की हानि में। यदि वे न होते, तो आज हजारों लोगों को जीवनदायी सन्देश प्रदान करनेवाले वे ग्रन्थ विद्वानों के विवाद के विषय ही बने रह जाते। उन्होंने एक विद्वान की भांति नहीं, अपितु एक अधिकारी व्यक्ति की भांति उपदेश दिया। क्योंकि उन्होंने जिस सत्यानुभूती का उपदेश किया, उसकी गहराइयों में वे स्वयं ही गोता लगा चुके थे और रामानुज की भांति उसके रहस्यों को चांडालों, जाति से बहिष्कृतों तथा विदेशियों को बतलाने के निमित्त ही वे वापस लौटे थे।

किन्तु फिर भी यह कथन कि उनके उपदेशों में कुछ नवीनता नहीं है, पूर्णतः सत्य नहीं है। हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि स्वामी विवेकानन्द ने ही अद्वैत दर्शन की श्रेष्ठता की घोषणा करते हुए कहा था कि इस अद्वैत में यह अनुभूति समाविष्ट है, जिसमें सब एक हैं, जो एकमेव - अद्वितीय है; परन्तु साथ ही उन्होंने हिन्दू धर्म में यह सिद्धान्त भी संयोजित किया कि द्वैत, विशिष्टाद्वैत और अद्वैत एक ही विकास के तीन सोपान या स्तर हैं, जिनमें अद्वैत ही अन्तिम लक्ष्य है। यह एक और भी महान् तथा अधिक सरल, इस सिद्धान्त का अंग है कि ' अनेक ' और ' एक ', विभिन्न समयों पर, विभिन्न वृत्तियों में, मन के द्वारा देखा जाने वाला एक ही तत्व है; अथवा जैसा कि श्रीरामकृष्ण ने उसी सत्य को इस प्रकार व्यक्त किया है, ' ईश्वर साकार और निराकार, दोनों ही है। ईश्वर वह भी है, जिसमें साकार और निराकार, दोनों समाविष्ट हैं। '

यही, वह वस्तु है, जो हमारे गुरुदेव के जीवन को सर्वोच्च महत्ता प्रदान करती है, क्योंकि यहां वे पूर्व और पश्चिम के ही नहीं, भूत और भविष्य के भी संगम - बिन्दु बन जाते हैं। यदि एक और अनेक सचमुच एक ही सत्य हैं, तो केवल उपासना के विविध प्रकार ही नहीं, अपितु सामान्य रूप से कर्म के भी सभी प्रकार, संघर्ष के भी सभी प्रकार, सृजन के भी सभी प्रकार, सत्य - साक्षात्कार के विभिन्न मार्ग हैं। अतः इसके बाद से अब, लौकिक और धार्मिक के बीच कोई भेद नहीं रह जाता। कर्म करना ही उपासना है। विजय प्राप्त करना ही त्याग है। स्वयं जीवन ही धर्म है। प्राप्त करना और अपने अधिकार में रखना भी उतना ही कठोर कर्तव्य है, जितना कि त्याग करना और विरत होना।

स्वामी विवेकानन्द की यही अनुभूति उन्हें उस कर्म का महान् उपदेष्टा सिद्ध करती है, जो ज्ञान तथा भक्ति से भिन्न नहीं, बल्कि उन्हीं को अभिव्यक्त करने वाला है। उनके लिए कारखाना, अध्ययनशाला, खेत और क्रीड़ाभूमि आदि भगवत् - साक्षात्कार के उतने ही उत्तम और योग्य स्थान हैं, जितने कि साधु की कुटिया अथवा मन्दिर का द्वार। उनके लिए मानव की सेवा तथा ईश्वर की पूजा, पौरुष तथा श्रद्धा; और सच्चे नैतिक बल तथा आध्यात्मिकता में कोई अन्तर नहीं है। एक दृष्टि से उनकी सम्पूर्ण वाणी को इसी केन्द्रीय दृष्टिकोण के भाष्य के रूप में पढ़ा जा सकता है। एक बार उन्होंने कहा था, ' कला, विज्ञान तथा धर्म एक ही सत्य की अभिव्यक्ति के तीन माध्यम हैं। लेकिन इसे समझने के लिए निश्चित ही हमें अद्वैत का सिद्धान्त चाहिए। '

भगिनी निवेदिता

Friday, April 17, 2020

संसार में रहकर क्या भगवान को प्राप्त किया जा सकता है ?

उत्तर -- अवश्य किया जा सकता है। परंतु जैसा कहा, साधु संग और सदा प्रार्थना करनी पड़ती है। उनके पास रोना चाहिए। मन का सभी मैल धुल जाने पर उनका दर्शन हो जाता है। मन मानो मिट्टी से लिपटी हुई एक लोहे की सुई है - ईश्वर है चुम्बक। मिट्टी रहते चुम्बक के साथ संयोग नहीं होता। रोते-रोते सुई की मिट्टी धुल जाती है। सुई की मिट्टी अर्थात् काम, क्रोध, लोभ, पापबुद्धि, विषयबुद्धि, आदि। मिट्टी धूल जाने पर सुई को चुम्बक खींच लेगा अर्थात ईश्वर दर्शन होगा। चित्तशुद्धि होने पर ही उसकी प्राप्ति होती है। ज्वर चढ़ा है, शरीर मानो भुन रहा है, इसमें कुनैन से क्या काम होगा ?

संसार में ईश्वर-लाभ होगा क्यों नहीं ? वही साधु-संग, रो-रोकर प्रार्थना, बीच बीच में निर्जनवास ; चारों ओर कटघरा लगाए बिना रास्ते के पौधों को गाय बकरियां खा जाती हैं।

साधु संग करने पर एक और उपचार होता है -- सत् और असत् का विचार। सत् नित्य पदार्थ अर्थात् ईश्वर, असत् अर्थात् अनित्य। असत् पथ पर मन जाते ही विचार करना पड़ता है। हाथी जब दूसरों के केले के पेड़ खाने के लिए सूँड बढ़ाता है, तो उसी समय महावत उसे अंकुश मारता है।

🌸जय ठाकुर जय भगवान🙏🏻

The Light Movie : Swami Vivekananda


Tuesday, April 14, 2020

👉 मांस का मूल्य

मगध सम्राट् बिंन्दुसार ने एक बार अपनी राज्य-सभा में पूछा :- देश की खाद्य समस्या को सुलझाने के लिए सबसे सस्ती वस्तु क्या है...? मंत्री परिषद् तथा अन्य सदस्य सोचमें पड़ गये। चावल, गेहूं, ज्वार, बाजरा आद तो बहुत श्रम बाद मिलते हैं और वह भी तब, जब प्रकृति का प्रकोप न हो। ऐसी हालत में अन्न तो सस्ता हो नहीं सकता.. शिकार का शौक पालने वाले एक अधिकारी ने सोचा कि मांस ही ऐसी चीज है, जिसे बिना कुछ खर्च किये प्राप्त किया जा सकता है.....उसने मुस्कुराते हुऐ कहा :- राजन्... सबसे सस्ता खाद्य पदार्थ मांस है। इसे पाने में पैसा नहीं लगता और पौष्टिक वस्तु खाने को मिल जाती है।सभी ने इस बात का समर्थन किया, लेकिन मगध का प्रधान मंत्री आचार्य चाणक्य चुप रहे। सम्राट ने उससे पुछा : आप चुप क्यों हो? आपका इस बारे में क्या मत है? चाणक्य ने कहा : यह कथन कि मांस सबसे सस्ता है...., एकदम गलत है, मैं अपने विचार आपके समक्ष कल रखूँगा....रात होने पर प्रधानमंत्री सीधे उस सामन्त के महल पर पहुंचे, जिसने सबसे पहले अपना प्रस्ताव रखा था। चाणक्य ने द्वार खटखटाया....सामन्त ने द्वार खोला, इतनी रात गये प्रधानमंत्री को देखकर वह घबरा गया। उनका स्वागत करते हुए उसने आने का कारण पूछा? प्रधानमंत्री ने कहा :-संध्या को महाराज एकाएक बीमार हो गए है उनकी हालत नाजूक है राजवैद्य ने उपाय बताया है कि किसी बड़े आदमी के हृदय का दो तोला मांस मिल जाय तो राजा के प्राण बच सकते है....आप महाराज के विश्वास पात्र सामन्त है। इसलिए मैं आपके पास आपके हृदय का दो तोला मांस लेने आया हूँ। इसके लिए आप जो भी मूल्य लेना चाहे, ले सकते है। कहे तो लाख स्वर्ण मुद्राऐं दे सकता हूँ.....। यह सुनते ही सामान्त के चेहरे का रंग फिका पड़ गया। वह सोचने लगा कि जब जीवन ही नहीं रहेगा, तब लाख स्वर्ण मुद्राऐं किस काम की? उसने प्रधानमंत्री के पैर पकड़ कर माफी चाही और अपनी तिजोरी से एक लाख स्वर्ण मुद्राऐं देकर कहा कि इस धन से वह किसी और सामन्त के हृदय का मांस खरीद लें मुद्राऐं लेकर प्रधानमंत्री बारी-बारी सभी सामन्तों, सेनाधिकारीयों के द्वार पर पहुँचे और सभी से राजा के लिऐ हृदय का दो तोला मांस मांगा, लेकिन कोई भी राजी न हुआ....सभी ने अपने बचाव के लिऐ प्रधानमंत्री को दस हजार, एक लाख, दो लाख और किसी ने पांच लाख तक स्वर्ण मुद्राऐं दे दी। इस प्रकार करोडो स्वर्ण मुद्राओं का संग्रह कर प्रधानमंत्री सवेरा होने से पहले अपने महल पहुँच गऐ और समय पर राजसभा में प्रधानमंत्री ने राजा के समक्ष दो करोड़ स्वर्ण मुद्राऐं रख दी....! सम्राट ने पूछा : यह सब क्या है....? यह मुद्राऐं किसलिऐ है? प्रधानमंत्री चाणक्य ने सारा हाल सुनाया और बोले: दो तोला मांस खरिदने के लिए इतनी धनराशी इक्कट्ठी हो गई फिर भी दो तोला मांस नही मिला। अपनी जान बचाने के लिऐ सामन्तों ने ये मुद्राऐं दी है। राजन अब आप स्वयं सोच सकते हैं कि मांस कितना सस्ता है....?? 

जीवन अमूल्य है। हम यह न भूलें कि जिस तरह हमें अपनी जान प्यारी होती है, उसी तरह सभी जीवों को प्यारी होती है..! इस धरती पर हर किसी को स्वेछा से जीने का अधिकार है... 🦆 🦐

Monday, April 13, 2020

गीता समझना है तो.... - विवेकानंद


एक दिन एक युवक स्वामी विवेकानंद के पास आया।

उसने कहा- मैं आपसे गीता पढ़ना चाहता हूं। स्वामीजी ने युवक को ध्यान से देखा और कहा- 6 माह प्रतिदिन फुटबॉल खेलो,‍ फिर आओ, तब मैं गीता पढ़ाऊंगा। युवक आश्चर्य में पड़ गया। गीताजी जैसे ‍पवित्र ग्रंथ के अध्ययन के बीच में यह फुटबॉल कहां से आ गया? इसका क्या काम? स्वामीजी उसको देख रहे थे। उसकी चकित अवस्था को देख स्वामीजी ने समझाया- बेटा! भगवद्गीता वीरों का शास्त्र है। एक सेनानी द्वारा एक महारथी को दिया गया दिव्य उपदेश है। अत: पहले शरीर का बल बढ़ाओ। शरीर स्वस्थ होगा तो समझ भी परिष्कृत होगी। गीताजी जैसा कठिन विषय आसानी से समझ सकोगे। जो शरीर को स्वस्थ नहीं रखता, सशक्त-सजग नहीं रख सकता अर्थात् जो शरीर को नहीं संभाल पाया, वह गीताजी के विचारों को, अध्यात्म को कैसे संभाल सकेगा। जीवन में कैसे उतार पाएगा? उसे पचाने के लिए स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मन ही चाहिए।